INSAT-4A: वह भारतीय उपग्रह जो अब मौन है, क्यों? और ISRO के पुराने उपग्रहों का भविष्य क्या है?
INSAT-4A भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा निर्मित एक महत्वपूर्ण संचार उपग्रह
INSAT-4A भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा निर्मित एक महत्वपूर्ण संचार उपग्रह था जिसने एक दशक से अधिक समय तक देश की संचार आवश्यकताओं को पूरा किया। लेकिन अब, यह उपग्रह काम क्यों नहीं कर रहा है? और जब ऐसे पुराने उपग्रह अपना जीवनकाल पूरा कर लेते हैं, तो उनका क्या होता है?
INSAT-4A ने काम करना क्यों बंद कर दिया?
INSAT-4A को 22 दिसंबर 2005 को एरियन-5 (Ariane-5) रॉकेट का उपयोग करके फ्रेंच गुयाना से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। यह भारत के INSAT-4 श्रृंखला के उपग्रहों में से एक था, जिसका मुख्य उद्देश्य डायरेक्ट-टू-होम (DTH) टेलीविजन प्रसारण और अन्य संचार सेवाओं के लिए उच्च-शक्ति वाला केयू-बैंड (Ku-band) ट्रांसपोंडर क्षमता प्रदान करना था।
यह उपग्रह इसलिए काम नहीं कर रहा है क्योंकि इसने सफलतापूर्वक अपना मिशन जीवनकाल पूरा कर लिया है।
- ईंधन की समाप्ति (End of Fuel): किसी भी भूस्थैतिक (Geostationary) उपग्रह को अपनी कक्षा में बने रहने और सही स्थान बनाए रखने के लिए समय-समय पर छोटे सुधारक फायरिंग की आवश्यकता होती है। यह सब ऑनबोर्ड ईंधन पर निर्भर करता है। INSAT-4A को 12 साल के मिशन जीवनकाल के लिए डिज़ाइन किया गया था, और इसने सफलतापूर्वक 14.5 वर्षों से अधिक समय तक सेवा प्रदान की। अपने अपेक्षित जीवनकाल के बाद, उपग्रह में कक्षीय युद्धाभ्यास के लिए पर्याप्त ईंधन समाप्त हो गया।
- आधिकारिक सेवानिवृत्ति: पर्याप्त ईंधन की कमी के कारण, उपग्रह को मार्च 2020 में आधिकारिक तौर पर सेवा से सेवानिवृत्त कर दिया गया।
इस प्रकार, INSAT-4A का काम न करना किसी खराबी का परिणाम नहीं है, बल्कि एक सफल मिशन की समाप्ति है जिसने अपने जीवनकाल को भी पार कर लिया।
⚰️ ISRO के पुराने उपग्रहों का भविष्य (डी-कमीशनिंग प्रक्रिया)
एक उपग्रह के मिशन जीवनकाल को पूरा करने के बाद, ISRO एक जिम्मेदार अंतरिक्ष एजेंसी के रूप में अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का पालन करते हुए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया अपनाता है जिसे डी-कमीशनिंग (Decommissioning) या समापन कहते हैं। यह प्रक्रिया भविष्य में अन्य उपग्रहों के लिए खतरा पैदा करने वाले अंतरिक्ष मलबे (Space Debris) को रोकने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
1. जियोस्टेशनरी ग्रेवयार्ड ऑर्बिट (GEO Graveyard Orbit)
चूंकि INSAT-4A एक भूस्थैतिक उपग्रह था, यह पृथ्वी से लगभग 35,786 किमी ऊपर की कक्षा में था। जब इसका मिशन समाप्त होता है, तो इसे निम्नलिखित प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है:
- बूस्ट-अप मैन्युवर (Boost-Up Maneuver): उपग्रह में बचे हुए अंतिम ईंधन का उपयोग करके इसे इसकी परिचालन कक्षा से लगभग 300 किमी ऊपर एक सुरक्षित, अप्रयुक्त कक्षा में धकेल दिया जाता है। इस कक्षा को "ग्रेवयार्ड ऑर्बिट" (Graveyard Orbit) या "डिस्पोजल ऑर्बिट" (Disposal Orbit) कहा जाता है।
- सुरक्षित स्थान: यह ग्रेवयार्ड ऑर्बिट यह सुनिश्चित करता है कि सेवानिवृत्त उपग्रह भविष्य में लॉन्च किए जाने वाले सक्रिय भूस्थैतिक उपग्रहों के लिए कोई खतरा या टकराव का जोखिम पैदा न करे।
- निष्क्रियता: ग्रेवयार्ड ऑर्बिट में पहुँचने के बाद, उपग्रह को निष्क्रिय कर दिया जाता है, ट्रांसपोंडर बंद कर दिए जाते हैं, और ऑनबोर्ड बैटरी को डिस्चार्ज कर दिया जाता है ताकि भविष्य में कोई विस्फोट न हो।
2. निम्न-पृथ्वी कक्षा (LEO) के उपग्रहों का भविष्य
ISRO के निम्न-पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit - LEO) में मौजूद पुराने उपग्रहों (जैसे कि कुछ रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट) को अलग तरह से निपटाया जाता है। उन्हें वायुमंडल में वापस खींचने के लिए डी-ऑर्बिट (De-Orbit) किया जाता है। घर्षण के कारण ये उपग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में जलकर नष्ट हो जाते हैं।
🇮🇳 ISRO का योगदान: अंतरिक्ष मलबे को कम करना
ISRO, संयुक्त राष्ट्र और इंटर-एजेंसी स्पेस डेब्रिस कोआर्डिनेशन कमेटी (IADC) द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करता है। INSAT-4A जैसे उपग्रहों को ग्रेवयार्ड ऑर्बिट में भेजने की प्रक्रिया यह दर्शाती है कि भारत अंतरिक्ष के स्थायी और सुरक्षित उपयोग के प्रति कितना प्रतिबद्ध है।
INSAT-4A ने अपना काम सफलतापूर्वक पूरा किया है और अब एक जिम्मेदार तरीके से सेवानिवृत्त हो चुका है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए अंतरिक्ष पर्यावरण सुरक्षित रहे।
क्या आप जानना चाहेंगे कि INSAT-4A की जगह अब ISRO ने कौन से नए और उन्नत संचार उपग्रह लॉन्च किए हैं?



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